गुड़ी पड़वा: हिंदू नववर्ष का शुभारंभ, उज्जैन से जुड़ी है विक्रम संवत की परंपरा
डेस्क रिपोर्ट | Sainv Sandesh
गुड़ी पड़वा का पर्व हिंदू धर्म में नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह पावन दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है, जिसे सृष्टि के आरंभ का दिन भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी, इसलिए इसे नए साल की शुरुआत के रूप में विशेष महत्व दिया जाता है।
उज्जैन से शुरू हुई विक्रम संवत की परंपरा
भारत की प्राचीन कालगणना प्रणाली विक्रम संवत की शुरुआत मध्य प्रदेश के उज्जैन से मानी जाती है। इतिहास के अनुसार सम्राट विक्रमादित्य ने इस पंचांग की स्थापना की थी, जो आज भी हिंदू धर्म के त्योहारों, शुभ मुहूर्त और धार्मिक कार्यों का आधार है।
उज्जैन में हर साल गुड़ी पड़वा के अवसर पर शिप्रा नदी के रामघाट पर भव्य आयोजन होते हैं। यहां आतिशबाजी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और ‘विक्रमोत्सव’ के जरिए इस दिन को धूमधाम से मनाया जाता है।
कई देशों में मान्यता
विक्रम संवत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल सहित कई देशों में इसका प्रचलन है। नेपाल में तो आधिकारिक रूप से इसी पंचांग के अनुसार वर्ष की गणना की जाती है। इसके अलावा मॉरीशस, सूरीनाम जैसे देशों में भी इसका प्रभाव देखने को मिलता है।
अंग्रेजी कैलेंडर से 58 साल आगे
विशेषज्ञों के अनुसार विक्रम संवत, ग्रेगोरियन (अंग्रेजी) कैलेंडर से करीब 58 वर्ष आगे चलता है। जहां वर्तमान में अंग्रेजी वर्ष 2026 चल रहा है, वहीं गुड़ी पड़वा के साथ विक्रम संवत 2083 की शुरुआत हो जाती है।
प्राचीन और प्रमाणिक कालगणना
इतिहासकारों का मानना है कि दुनिया में कई संवत प्रचलित रहे, लेकिन विक्रम संवत सबसे अधिक सटीक और व्यापक रूप से उपयोग में आने वाला पंचांग है। विवाह, पर्व-त्योहार, व्रत और अन्य धार्मिक आयोजन आज भी इसी के अनुसार तय किए जाते हैं।
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