Himachal News: बारिश की कमी से जंगलों में नहीं मिल रही गुच्छी मशरूम, मार्च में भी बाजार सूने
शिमला
Himachal Pradesh में इस वर्ष मौसम की बेरुखी का असर पहाड़ों की मशहूर और महंगी सब्जी Gucchi Mushroom पर भी देखने को मिल रहा है। पर्याप्त बारिश और बर्फबारी न होने के कारण जंगलों में गुच्छी मशरूम उग ही नहीं पाई है, जिससे इस साल बाजारों में इसकी भारी कमी देखने को मिल रही है।
आमतौर पर मार्च महीने में Shimla के बाजारों में गुच्छी की आवक शुरू हो जाती थी, लेकिन इस बार अभी तक यह ढूंढे भी नहीं मिल रही।
पहाड़ी लोगों की आय पर असर
गुच्छी मशरूम प्राकृतिक रूप से हिमालयी जंगलों में उगती है। स्थानीय लोग जनवरी से मार्च के बीच जंगलों में जाकर इसे खोजते हैं और फिर बाजारों में बेचते हैं।
बाजार में इसकी कीमत करीब 6 हजार से 12 हजार रुपये प्रति किलो तक होती है। इसी वजह से यह पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है।
लेकिन इस वर्ष मौसम में आए बदलाव ने ग्रामीणों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
20 साल में कभी-कभार बनती है ऐसी स्थिति
जनेड़ घाट निवासी सुरेंद्र कुमार का कहना है कि जिला शिमला में ऐसी स्थिति 20 साल में एक-दो बार ही देखने को मिलती है। वहीं पिछले 5-6 वर्षों में पहली बार हुआ है कि जंगलों में गुच्छी बिल्कुल नहीं मिल रही।
कोटी क्षेत्र के राम प्रकाश ने बताया कि हर साल इस समय तक ग्रामीण गुच्छी खोजने जंगलों में निकल जाते थे, लेकिन इस बार कई जगह खोजने के बावजूद उन्हें कुछ भी नहीं मिला।
बारिश और बर्फबारी की कमी बनी वजह
स्थानीय लोगों का कहना है कि जनवरी और फरवरी में बारिश और बर्फबारी कम होने से जंगलों की मिट्टी में नमी नहीं है। यही वजह है कि गुच्छी मशरूम उग नहीं पाई।
पौष्टिकता से भरपूर होती है गुच्छी
गुच्छी मशरूम में प्रोटीन, एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन और मिनरल्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। भारत में यह मुख्य रूप से Uttarakhand, Himachal Pradesh और Jammu and Kashmir के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में पाई जाती है।
बाजारों में सिर्फ सैंपल के तौर पर पुरानी गुच्छी
राजधानी शिमला के गंज बाजार में हर साल गुच्छी का लाखों रुपये का कारोबार होता था, लेकिन इस बार बाजार में नई गुच्छी देखने को भी नहीं मिल रही।
व्यापारियों का कहना है कि पहले रामपुर, चौपाल और करसोग से लोग गुच्छी लेकर बाजार पहुंचते थे और यहां से दिल्ली समेत अन्य शहरों में इसकी सप्लाई होती थी। विदेशों से भी इसकी मांग आती है, लेकिन इस बार जंगलों में नमी की कमी के कारण फसल ही नहीं उगी।
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