अध्ययन में खुलासा: ट्रांस हिमालय की 2,292 ग्लेशियल झीलों से हिमाचल, पंजाब और जम्मू-कश्मीर को खतरा
हिमाचल प्रदेश: ट्रांस हिमालय से जुड़े क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से बन रही ग्लेशियल झीलें आने वाले समय में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं। हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद (हिमकोस्टे) के ताजा अध्ययन में अकेले सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें सामने आई हैं।
अध्ययन के मुताबिक इनमें 1,335 झीलें चीन अधिकृत तिब्बत में हैं, जहां भारत का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं होने के कारण उनकी निगरानी चुनौतीपूर्ण है। वहीं 470 झीलें स्पीति और 487 किन्नौर के खाब से नीचे हिमाचल प्रदेश में आने वाले सतलुज क्षेत्र में हैं। इनमें 49 झीलें 10 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैली हुई हैं।
49 झीलें 10 हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में
सतलुज बेसिन में 49 ग्लेशियल झीलों का क्षेत्रफल 10 हेक्टेयर से अधिक है, जबकि 51 झीलें 5 से 10 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हैं। अध्ययन में सामने आई 2,292 झीलों में से अधिकांश का क्षेत्रफल पांच हेक्टेयर से कम है।
चिनाब बेसिन में लाहौल-स्पीति के सिस्सू के पास स्थित गीपनगाथ झील का क्षेत्रफल भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 1975 में करीब 27 हेक्टेयर में फैली यह झील अब लगभग 110 हेक्टेयर तक पहुंच चुकी है। इसकी औसत गहराई करीब 36 मीटर बताई गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक प्राकृतिक बांध कमजोर होने, भूस्खलन, हिमस्खलन या भूकंप जैसी परिस्थितियों में झील टूटने पर पानी और मलबे का तेज बहाव निचले इलाकों में भारी तबाही मचा सकता है।
तिब्बत की झीलों पर निगरानी बड़ी चुनौती
हिमकोस्टे के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. एसएस रंधावा के अनुसार, 2023 की उपग्रह तस्वीरों के आधार पर किए गए अध्ययन में सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें चिन्हित हुई हैं।
इससे पहले 2019 के उपग्रह डेटा में चिनाब बेसिन में 242, ब्यास में 93 और रावी में 38 झीलें चिह्नित की गई थीं। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमाचल में संभावित बाढ़ मार्गों की पहचान के साथ-साथ पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना बेहद जरूरी है।
सांगला में यारपाबंग झील बनी चिंता
सांगला वैली के देबार कंडे में बढ़ती यारपाबंग झील भी स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। करीब 550 मीटर लंबी और 260 मीटर चौड़ी इस झील के टूटने की स्थिति में बस्पा और सतलुज नदी के किनारे बसे क्षेत्रों में भारी नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
हिमाचल की चार झीलें सबसे खतरनाक
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने हिमाचल की चार ग्लेशियल झीलों को बेहद संवेदनशील माना है। इनमें कुल्लू की वासुकी झील, लाहौल-स्पीति की गिपांग झील, किन्नौर की बास्पा झील और सतलुज बेसिन की काशंग गाड़ स्थित कलका झील शामिल हैं। इनकी निगरानी के लिए अर्ली वर्निंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं।
पहले भी सतलुज में आ चुकी है विनाशकारी बाढ़
साल 2000 में आई बाढ़ के दौरान सतलुज का जलस्तर सामान्य से करीब 60 फीट ऊपर पहुंच गया था। करीब 200 किलोमीटर एनएच-22 प्रभावित हुआ, 20 पुल और 22 झूले बह गए। इस आपदा में 135 लोगों की मौत हुई थी और करीब 1,466 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।
इसके बाद 26 जून 2005 को तिब्बत में पारछू झील टूटने के बाद सतलुज में बाढ़ आई थी। वांगतू से समदो के बीच करीब 10 किलोमीटर एनएच-22 बह गया था। इस दौरान 10 पुल और 11 रोपवे भी तबाह हुए थे।
विशेषज्ञों ने चेताया
विशेषज्ञों का कहना है कि सभी ग्लेशियल झीलें खतरनाक नहीं होतीं, लेकिन तेजी से बढ़ रही और अस्थिर झीलों की पहचान करना जरूरी है। नदियों के किनारे निर्माण पर सख्त नीति, उपग्रह आधारित निगरानी और मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली से संभावित नुकसान को कम किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने भी लाहौल-स्पीति में बनी झील को लेकर अध्ययन और निगरानी की जरूरत पर जोर दिया है।

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