यूपीआई तंत्र के हित में है, एमडीआर। (संपादकीय)
“यूपीआई तंत्र के हित में है, एमडीआर।”
संपादकीय....
विकास कुमार
यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस वह सिस्टम है, जिसकी वजह से हम मोबाइल से तुरंत किसी को भी पैसे भेज या मंगवा सकते हैं। इसे 2016 में एनपीसीआई (नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) ने शुरू किया था और तब सिर्फ 44 बैंक इससे जुड़े थे। आज 750 से अधिक बैंक इससे जुड़े हैं। शुरुआत में इसका इस्तेमाल बहुत कम था, लेकिन आज हर महीने 2,400 करोड़ से भी ज्यादा लेनदेन इसी के जरिए हो रहे हैं। यानी हर दिन करीब 80 करोड़ से अधिक बार लोग यूपीआई से पैसे भेज या ले रहे हैं।
यह बदलाव सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं। गांव की छोटी दुकान, ठेले वाला, ऑटो चालक आदि सब यूपीआई क्यूआर कोड से जुड़ चुके हैं। इसने नकदी पर निर्भरता को कम किया है और बैंकिंग को उन लोगों तक पहुंचाया है, जिनके पास पहले कभी डेबिट-क्रेडिट कार्ड नहीं था। इसने छोटे व्यापारियों को बिना किसी भारी उपकरण या शुल्क के डिजिटल भुगतान अपनाने का मौका दिया।
अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो यूपीआई ने भुगतान की लागत को शून्य कर दिया, जिससे औपचारिक अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ा और वित्तीय समावेशन को नई गति मिली। यही वजह है कि आज यूपीआई सिर्फ एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
यूपीआई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब सराहा गया है। आईएमएफ ने जून 2025 में यूपीआई को दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम भुगतान तंत्र बताया था, जो विश्व का करीब 49 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन संभालता है—ब्राजील, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से भी अधिक। आज भूटान, नेपाल, सिंगापुर, यूएई, फ्रांस, श्रीलंका, मॉरीशस और मालदीव समेत करीब एक दर्जन देश यूपीआई को अपना चुके हैं और कई देश अपने डिजिटल भुगतान के लिए इसे आंकड़ों और अर्थशास्त्र की नजर से देखना जरूरी है।
सबसे पहली बात यह कि ₹2,000 रुपये तक के यूपीआई भुगतान पूरी तरह मुफ्त ही रहेंगे और यही रकम कुल भुगतान (यानी जब किसी दुकानदार को यूपीआई से पैसे दिए जाते हैं) का 95 प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा है। मतलब सौ में से 95 से ज्यादा बार जब आप यूपीआई से पैसे देंगे तो कोई शुल्क नहीं लगेगा।
यूपीआई भुगतान पर शुल्क सिर्फ उन पांच प्रतिशत से भी कम लेनदेन पर लगेगा जो ₹2,000 से अधिक के होंगे और वह भी सिर्फ बड़े दुकानदारों-कारोबारियों पर। जो छोटे दुकानदार महीने में एक लाख रुपये तक यूपीआई क्यूआर कोड से कमाते हैं, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। उनके लिए सब कुछ पहले जैसा मुफ्त ही रहेगा।
दर भी बहुत मामूली रखी गई है—सिर्फ 0.4 प्रतिशत और वह भी ₹75,000 या उससे अधिक के लेनदेन पर अधिकतम 300 तक। यह शुल्क ग्राहक से नहीं, बल्कि दुकानदार से लिया जाएगा यानी ₹3,000 की खरीदारी पर दुकानदार को सिर्फ 12 रुपये का एमडीआर देना होगा। ₹1,00,000 की खरीदारी पर 0.4% के हिसाब से 400 बनते हैं, लेकिन दुकानदार से अधिकतम 300 ही लिया जाएगा।
रेलवे टिकट, बीमा प्रीमियम, बिजली-पानी बिल, पेट्रोल पंप और स्कूल-कॉलेज की फीस आदि पर तो और भी राहत है। वहां प्रतिशत की जगह सिर्फ 5 रुपये का फ्लैट शुल्क ही लगेगा, चाहे रकम कितनी भी बड़ी क्यों न हो।
भारत में क्रेडिट कार्ड पर दुकानदारों को आमतौर पर 1.5 से 2.5 प्रतिशत तक शुल्क देना पड़ता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह करीब 0.9 प्रतिशत तक जा सकता है। इस हिसाब से यूपीआई की 0.4 प्रतिशत दर अब भी सबसे सस्ती रहेगी—क्रेडिट कार्ड से चार-छह गुना कम और डेबिट कार्ड से भी काफी कम।
इसका मतलब है कि दुकानदारों के पास डिजिटल भुगतान अपनाते रहने की वजह बनी रहेगी और नकदी की तरफ लौटने का खतरा नहीं बढ़ेगा।
बाकी बड़े देशों से तुलना करें तो भारत की यह दर वाकई कम ठहरती है। चीन में अलीपे जैसे मोबाइल-वॉलेट दुकानदारों से 0.6 प्रतिशत तक शुल्क लेते हैं यानी यूपीआई से भी ज्यादा, जबकि वहां भी लेनदेन की संख्या भारत जैसी ही बहुत बड़ी है।


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