फर्जी फास्टैग मामले में इटौंजा टोल प्लाजा पर STF का छापा, सर्वर और DVR जब्त
यूपी: फर्जी फास्टैग मामले में इटौंजा टोल प्लाजा पर STF का छापा, सर्वर और DVR जब्त
लखनऊ। फर्जी फास्टैग और वाहन नंबर के जरिए टोल चोरी करने तथा ऑनलाइन चालान से बचने के मामले में उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने मंगलवार को बड़ी कार्रवाई की। टीम ने लखनऊ-सीतापुर एक्सप्रेसवे स्थित इटौंजा टोल प्लाजा पर छापा मारकर सर्वर, सीसीटीवी कैमरों की डीवीआर और टोल से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त कर लिए।
एसटीएफ की कार्रवाई के बाद टोल प्लाजा का सर्वर उपलब्ध नहीं रहा, जिसके चलते टोल वसूली प्रक्रिया बंद हो गई। टोल प्लाजा का संचालन लखनऊ सीतापुर एक्सप्रेसवे लिमिटेड के पास है। जांच के दायरे में कंपनी के कई अधिकारी और कर्मचारी भी हैं।
आरोपी की गिरफ्तारी के बाद कार्रवाई
एसटीएफ की यह कार्रवाई सोमवार को फर्जी फास्टैग के जरिए टोल और ऑनलाइन चालान से बचने वाले गिरोह के एक आरोपी की गिरफ्तारी के बाद हुई। टीम ने सीतापुर निवासी मुनीश को गिरफ्तार किया है, जबकि उसके साथी रियाज और सिराज की तलाश जारी है।
सात महीने पहले दर्ज हुई थी एफआईआर
फर्जी फास्टैग के जरिए टोल चोरी का मामला करीब सात महीने पहले सामने आया था। एआरटीओ लखनऊ दक्षिणी की शिकायत पर सरोजनीनगर थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। बाद में मामले की विवेचना एसटीएफ को सौंप दी गई। इसके बाद से एसटीएफ मामले की जांच कर रही थी।
कंपनी पर रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराने का आरोप
जांच के दौरान एसटीएफ ने टोल संचालन करने वाली कंपनी से फास्टैग लेन-देन, वाहनों की आवाजाही और अन्य जरूरी रिकॉर्ड मांगे थे। एसटीएफ के मुताबिक, कंपनी की ओर से रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया।
रिकॉर्ड नहीं मिलने के बाद एसटीएफ ने अदालत का रुख किया और वारंट हासिल किया। इसके बाद मंगलवार को टीम इटौंजा टोल प्लाजा पहुंची। कार्रवाई के दौरान सर्वर, सीसीटीवी रिकॉर्डिंग की डीवीआर और अन्य दस्तावेज जब्त किए गए।
एसटीएफ अब जब्त किए गए सर्वर और डीवीआर की जांच कर रही है। इसके जरिए फर्जी फास्टैग वाले वाहनों के टोल पार करने की संख्या और मामले में शामिल अन्य लोगों की भूमिका का पता लगाने का प्रयास किया जाएगा।
एक फास्टैग, दो वाहन नंबर का खेल
जांच में सामने आया कि गिरोह कथित तौर पर असली वाहन के बजाय किसी दूसरे वाहन के नंबर पर फास्टैग बनवाता था। चेकिंग के दौरान उसी फर्जी नंबर की पर्ची दिखाई जाती थी। ऑनलाइन चालान होने पर वह दूसरे वाहन के नाम दर्ज हो जाता था।
इस तरीके से टोल चोरी करने के साथ-साथ चालान और अन्य कार्रवाई से बचने का रास्ता तैयार किया जाता था। मामले में एसटीएफ की जांच जारी है।
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