जोर सुधार पर हो (संपादकीय)
“जोर सुधार पर हो”
संपादकीय....
विकास कुमार
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के विरोध में विपक्षी दलों और विशेष रूप से कांग्रेस की आक्रामकता जिस तरह बढ़ती जा रही है और उसने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़कों पर उतरने का जो फैसला किया, उससे इस प्रक्रिया को लेकर विवाद ही बढ़ रहा है। इसके कारण कुछ लोगों के मन में संशय भी पैदा हो रहा है। यह किसी के भी हित में नहीं, क्योंकि निष्पक्ष चुनावों के लिए मतदाता सूचियों का सही होना जरूरी है। यह एक तथ्य है कि मतदाता सूचियों को शुद्ध करने और खासकर उनमें से फर्जी-अपात्र वोटरों को बाहर करने की मांग कांग्रेस समेत सभी दल करते रहे हैं। यह प्रक्रिया नई भी नहीं है। इतना अवश्य है कि चुनाव आयोग की सुस्ती के चलते यह करीब दो दशक बाद हो रही है। बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसे गलत बताने का विपक्ष का अभियान तेज हो रहा है। वास्तव में इसी इरादे से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे वोट चोरी का नाम दे दिया है। यह तब है, जब सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया को आवश्यक मान रहा है और उसे आगे बढ़ाने की अनुमति भी दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से एसआईआर प्रक्रिया की सुनवाई कर रहा है। अब उसे इसे लेकर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए और चुनाव आयोग को उन तौर-तरीकों को अपनाने के लिए कहना चाहिए, जिनसे यह प्रक्रिया सुगम तरीके से संपन्न हो सके और किसी पात्र मतदाता को शिकायत का अवसर न मिले। यह सही है कि एसआईआर जैसी व्यापक प्रक्रिया में कुछ न कुछ त्रुटियां होंगी, लेकिन चुनाव आयोग को यह चाहिए कि वह इसे यथासंभव त्रुटिरहित बनाए। इसी के साथ उसे ऐसे भी उपाय करने चाहिए, जिससे यह प्रक्रिया सतत चलती रहे और लोगों के लिए सुविधाजनक भी हो, ताकि हर वैध मतदाता अपना नाम वोटर लिस्ट में शामिल करा सके।
उचित यह होगा कि चुनाव आयोग एसआईआर के मामले में लोगों को आवेदन करने या अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए समय-सीमा में न बांधे। उसकी ओर से समय-सीमा तय कर देने से यह संदेश निकलता है कि यदि किसी कारण किसी का नाम वोटर लिस्ट में शामिल होने से रह गया तो वह मताधिकार से वंचित हो जाएगा। इस आशंका को दूर करना सुप्रीम कोर्ट का भी काम है और चुनाव आयोग का भी।
एसआईआर के मामले में यह भी समय की मांग है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव आयोग का सहयोग करें। विपक्षी दलों का यह रवैया ठीक नहीं कि वे एसआईआर की छोटी-मोटी कमियों को लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश बताकर लोगों को गुमराह करने का काम करें। आखिर जब सुप्रीम कोर्ट एसआईआर को लेकर की जा रही सभी शिकायतों की सुनवाई कर रहा है, तब फिर चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर उतरने का क्या औचित्य?
बिहार से शुरू हुई यह प्रक्रिया जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसे गलत बताने का विपक्ष का अभियान तेज हो रहा है। वास्तव में इसी इरादे से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे वोट चोरी का नाम दे दिया है। यह तब है, जब सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया को आवश्यक मान रहा है और उसे आगे बढ़ाने की अनुमति भी दे रहा है।
सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से एसआईआर प्रक्रिया की सुनवाई कर रहा है। अब उसे इसे लेकर अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए और चुनाव आयोग को उन तौर-तरीकों को अपनाने के लिए कहना चाहिए, जिनसे यह प्रक्रिया सुगम तरीके से संपन्न हो सके और किसी पात्र मतदाता को शिकायत का अवसर न मिले। यह सही है कि एसआईआर जैसी व्यापक प्रक्रिया में कुछ न कुछ त्रुटियां होंगी, लेकिन चुनाव आयोग को यह चाहिए कि वह इसे यथासंभव त्रुटिरहित बनाए।


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